Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 100, Verses 42–43
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 100, verses 42–43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 100 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
बन्धमोक्षादिसंमोहो न प्राज्ञस्यास्ति कश्चन ।
संमोहबन्धमोक्षादि ह्यज्ञस्यैवास्ति राघव ॥ ४२ ॥
आदौ मनस्तदनु बन्धविमोक्षदृष्टी पश्चात्प्रपञ्चरचना भुवनाभिधाना ।
इत्यादिका स्थितिरियं हि गता प्रतिष्ठामाख्यायिका सुभग बालजनोदितेव ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे महामते, जिसकी बुद्धि प्रबुद्ध हे, यानी जो ज्ञानी है,
उसके प्रति रज्जुमें सर्पकी कल्पना के तुल्य बन्ध-मोक्षकी कल्पना अवास्तविक (तुच्छ) है,
पूर्वोक्त अनिर्वचनीयता तो अबुद्धमति यानी अज्ञानी के प्रति ही है, ज्ञानी के प्रति नहीं है ॥ ४ १॥
हे रघुवर, बुद्धिमान् को (ज्ञानीको) बन्ध, मोक्ष आदिका संमोह कुछ भी नहीं होता हे, मोहजनित
बन्ध, मोक्ष आदि अज्ञानी को ही होते हैं