Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 100, Verse 35
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 100, verse 35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 100 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
आत्मैवानात्मवदिह जीवो जगति राजते ।
द्वीन्दुत्वमिव दुर्दृष्टेः सच्चासच्च समुत्थितम् ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
आत्मा
ही इस जगत् में अनात्मभूत अहंकार के अभेद से अनात्मा की नाई जीवरूपसे विराजमान
है । जैसे दृष्टि के दोष से एक ही चन्द्रमा दो रूपों से प्रकट होता है, वैसे ही अज्ञानवश वह
आत्मा ही दो रूपों से प्रकट होता है । द्वितीय रूप से (विषयरूप से) वह असत् है और
परमार्थरूप से सत् हे