Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 100, Verse 29
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 100, verse 29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 100 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
स्वात्मन्येवातपस्तीव्रो मृगतृष्णिकया यथा ।
विचित्रेण विचित्रोऽपि प्रस्फुरत्यात्मना तथा ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे प्रचंड सूर्य के प्रकाश अपनेमें ही
मृगतृष्णारूप से स्फुरित होता है वैसे ही नामरूप रहित ब्रह्म भी अपने आप जगद्वैचित्र्यरूप
से स्फुरित होता है