Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 100, Verses 22–23
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 100, verses 22–23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 100 · श्लोक 22, 23
संस्कृत श्लोक
देशकालादिवैचित्र्यात्क्ष्मातलादिव शालयः ।
न जातं प्रतिभासेन तेनैवान्येन पश्यति ॥ २२ ॥
प्रतियोगिव्यवच्छेदसंख्यारूपादयश्च ये ।
मनःशब्दैः प्रकल्प्यन्ते ब्रह्मजान्ब्रह्म विद्धि तान् ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
यह प्रतियोगी, भेद, संख्या, रूप आदिस्वरूप जगत् की विचित्रता कल्पना द्वारा मानकर
दशर गई है, परमार्थद्राष्टि से यह मनशब्द से कल्पित ब्रह्मका प्रतिभासमात्र ही है। जो केवल
प्रतिभासमात्र है, उसमें वास्तविकताका संभव नहीं है । अतः प्रतिभासिक यह जगज्जाल न तो
उत्पन्न हुआ है, न कुछ है और न कोई किसीसे इसे देखता है । पूर्वोक्ति जगद्वैचित्रय मनशब्द
से कल्पित ब्रह्म से उत्पन्न हुआ है, अतः केवल ब्रह्मरूप ही है, ऐसा आप जानिये; यों
श्रीवस्रिष्ठजी श्रीरामचन्द्रजीसे कहते है ।
प्रतिभास से जो उत्पन्न हुआ है वह उत्पन्न नहीं हुआ हे, क्योकि प्रतिभासिक (मृगतृष्णा
आदि) में वास्तविकता नहीं हो सकती है; अथवा न किसीको किसी दूसरे करण आदि से
कोई देखता है । “यत्र त्वस्य सर्वमात्मेवाभूत् तत् केन कं पश्येत्“ (जिस अवस्थामें इसका
सब आत्मा ही हो गया वहाँ पर किसको किससे देखे) ऐसी श्रुति हे । प्रतियोगी, भेद, संख्या,
रूप आदि जो कुछ पदार्थजात है, उनकी कल्पना मनःशब्दकल्पित ब्रह्म से होती है, अतः
उनको आप ब्रह्म ही जानिये