Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 100, Verses 40–41
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 100, verses 40–41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 100 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
एवमज्ञानकादेव बन्धमोक्षदृशोऽस्मृतेः ।
वस्तुतस्तु न बन्धोऽस्ति न मोक्षोऽस्तिमहामते ॥ ४० ॥
कल्पनाया अवस्तुत्वं संप्रबुद्धमतिं प्रति ।
रज्ज्वहेरिव हे प्राज्ञ तत्त्वबुद्धमतिं प्रति ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
पूर्वोक्त रीति से तुच्छ अज्ञानसे ही बन्ध और
मोक्षकी दृष्टियाँ उत्पन्न हुई ह । “नाऽसतो विद्यते भावो नाऽभावो विद्यते सतः । उभयोरपि
दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः' (असत् की सत्ता नहीं होती और सत् का अभाव नहीं होता,
इन दोनों का ही निर्णय तत्त्वदर्शियोंने देखा है) इस स्मृतिके विरोधसे सत्-असत् के मध्यवर्ती
अनिर्वचनीयता में यौक्तिक दृष्टिकी विश्रान्ति नहीं हो सकती हे, अतएव हे महामते, वस्तुतः
न तो बन्ध है और न मोक्ष है