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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 100, Verses 26–28

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 100, verses 26–28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 100 · श्लोक 26-28

संस्कृत श्लोक

ज्ञस्य सर्वं चितं राम ब्रह्मैवावर्तते सदा । कल्लोलोर्मितरङ्गौघैरब्धेर्जलमिवात्मनि ॥ २६ ॥ द्वितीया नास्ति सत्तैका नामरूपक्रियात्मिका । परे नानातरङ्गेऽब्धौ कल्पनेव जलेतरा ॥ २७ ॥ जायते नश्यति तथा यदिदं याति तिष्ठति । तदिदं ब्रह्मणि ब्रह्म ब्रह्मणा च विवर्तते ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे सागर का जल कल्लोल, लहर और तरंगके रूप मे चारों ओर स्थित रहता है वैसे ही ज्ञानीकी दृष्टि में यह सारा प्रपंच परिपूर्ण ब्रह्म ही चारों ओरसे विद्यमान है, प्रपंच परिपूर्ण ब्रह्म से अतिरिक्त नहीं हे । जैसे विविध तरगों से व्याप्त विशाल सागर में जलसे अतिरिक्त कोई कल्पना नहीं हे यानी जल से अतिरिक्त कुछ नहीं है, एकमात्र जल ही है; वैसे ही परम ब्रह्मम नामरूपात्मक दूसरी सत्ता नहीं हे, किन्तु एक ही सत्ता हे । जो यह जगज्जाल उत्पन्न होता है, नष्ट होता है, गमन करता है, स्थित होता है वह ब्रह्मे ब्रह्म ही ब्रह्म से 4& एेन्दवों का आख्यान पीछे कहा गया है । अवास्तविकरूप से भासित होता है