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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 100, Verse 34

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 100, verse 34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 100 · श्लोक 34

संस्कृत श्लोक

चिन्मयेनात्मनाऽज्ञेन स्वसंकल्पनया स्वयम् । शून्यता गगनेनेव जीवता प्रकटीकृता ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे बन्धु ही क्‍यों न हो, यदि यह मेरा बन्धु है, ऐसा ज्ञान न हो तो शीघ्र ही अबन्धु हो जाता है, वैसे ही अज्ञानसे आवृत्त जो परम धाम (परब्रह्म) है, वही चित्त और जीव नामसे कहा जाता है, यानी अज्ञानवश ब्रह्म में ही जीवभाव, चित्तभाव आदि उदित हुए हैं ॥ ३ ३॥ अशून्य भी आकाश जैसे अपनी शून्यता प्रकट करता है, वैसे ही अज्ञानावृत्त चिन्मय आत्माने अपनी कल्पनासे स्वयं जीवत्व प्रकट किया है