Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 100, Verses 7–10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 100, verses 7–10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 100 · श्लोक 7,8
संस्कृत श्लोक
चिच्छक्तिर्ब्रह्मणो राम शरीरेष्वभिदृश्यते ।
स्पन्दशक्तिश्च वातेषु जडशक्तिस्तथोपले ॥ ७ ॥
द्रवशक्तिस्तथाम्भःसु तेजःशक्तिस्तथाऽनले ।
शून्यशक्तिस्तथाकाशे भावशक्तिर्भवस्थितौ ॥ ८ ॥
ब्रह्मणः सर्वशक्तिर्हि दृश्यते दशदिग्गता ।
नाशशक्तिर्विनाशेषु शोकशक्तिश्च शोकिषु ॥ ९ ॥
आनन्दशक्तिर्मुदिते वीर्यशक्तिस्तथा भटे ।
सर्गेषु सर्गशक्तिश्च कल्पान्ते सर्वशक्तिता ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
हे रामचन्द्रजी, जरायुज, अण्डज,
स्वेदज ओर उद्भिज्ज-इन चार प्रकार के प्राणियों में ब्रह्म की चित्-शक्ति दिखाई देती हे ।
वायु ओम ब्रह्म की स्पन्दनशक्ति, पत्थरमें जड़शक्ति, जलमें द्रवशक्ति, अग्निमें तेज:शक्ति,
आवरणरहित होनेके कारण आकाशमें शून्यशक्ति यानी सर्वावरणशक््ति ओर जगत्स्थितमें
भावशक्ति (“हे' इस प्रकार की व्यवहारयोग्यता) है