Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 100, Verse 31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 100, verse 31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 100 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
न लोभोऽस्ति न मोहोऽस्ति न तृष्णास्ति न रञ्जना ।
क आत्मन्यात्मनोलोभस्तृष्णामोहोऽथवाकुतः ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
न लोभ है, न मोह है, न तृष्णा है ओर न अत्यन्त
आसक्ति हे । आत्मा में आत्मा का लोभ कैसा अथवा आत्मा में आत्मा की तृष्णा या मोह
कैसे हो सकता है ? दूसरे के अभावमें लोभ, मोह आदिकी प्राप्ति ही नहीं हो सकती है, यह
भाव है