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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 100, Verse 38

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 100, verse 38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 100 · श्लोक 38

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । मनो यं निश्चयं याति तत्तद्भवति नान्यथा । तेन काल्पनिको नास्ति बन्धः कथमिह प्रभो ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

क्योकि - न निरोधो न वोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः । न मुमुक्षुर्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता ॥ ऐसी श्रुति है। चूँकि पहले यौक्तिक ष्टि से काल्पनिक अनिर्वचनीय बन्ध का विस्तार से उपपादन किया गया है, अतएव काल्पनिक होते हुए भी बन्ध की तुच्छत्वउक्ति को सहन न कर रहे श्रीरामचन्द्रजी पूछते हैं । हे प्रभो, आप पहले विस्तार से कह आये हैं कि मन जिस निश्चय को प्राप्त होता है, वही हो जाता है। उसमें कुछ भी अन्तर नहीं पड़ता हे । इससे यहाँ काल्पनिक बन्ध नहीं है, यह आपने कैसे कहा ?