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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 100, Verse 39

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 100, verse 39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 100 · श्लोक 39

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । मिथ्या काल्पनिकीवेयं मूर्खाणां बन्धकल्पना । मिथ्यैवाभ्युदिता तेषामितरा मोक्षकल्पना ॥ ३९ ॥

हिन्दी अर्थ

यौक्तिकद्रष्टि की लौकिकद्रष्टि की दृढ़ता का विघटन करने के लिए परमार्थदृष्टि के द्वाररूप से कल्पना की गई है, इसलिए वहींपर उसकी विश्रान्ति नहीं है, किन्तु श्रुति द्वारा प्रतिपादित बन्ध की तुच्छतादृष्टि मे विश्रान्ति है, इस आशय से श्रीवस्निष्ठजी उत्तर देते हैं । श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, जैसे स्वप्नकी कल्पना जाग्रतदृष्टि से तुच्छ हो जाती है, वैसे ही अज्ञानियों की यह बन्ध की कल्पना मिथ्या है, इसलिए उनकी दूसरी मोक्षकल्पना भी मिथ्या ही उदित हुई हे