Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 100, Verse 12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 100, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 100 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
प्रतिभासवशादेव मध्यस्थं चित्तजाड्ययोः ।
जीवेतराभिधं चित्तमन्तर्ब्रह्मणि दृश्यते ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्म के प्रथम कार्य चित्त में चित्त और जडता दिखाई देने से भी अज्ञात ब्रह्म ही जगत् का
कारण है, इस आशय से कहते हैं ।
चित्ता और जडता के मध्य में स्थित मन, जिसका दूसरा नाम जीव है, अज्ञान साक्षी के
कारण ही ब्रह्म के मध्य में दिखाई देता है