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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 100, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 100, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 100 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । चित्तमेतदुपायातं ब्रह्मणः परमात्पदात् । अतन्मयं तन्मयं च तरङ्गः सागरादिव ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

बन्ध ओर मोक्ष की कल्पना मनके अधीन ही है, ऐसा जो पीछे कहा था, उसमें उपपत्ति दिखलातेहै। श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, जेसे सागर से जलकी विकाररूप ओर जलसत्ता की विवर्तरूप तरगे उठती हैं वैसे ही परमपदरूप ब्रह्म से यह चित्त आया है, जो कि अब्रह्मभूत अज्ञानका विकार और शुद्ध ब्रह्म का विवर्त है

सर्ग सन्दर्भ

निन्यानबेर्वौँ सर्ग समाप्त सोवों सर्ग मन की शक्ति से ब्रह्म की सर्वशक्तिता का तथा एकमात्र अज्ञानसे अद्वितीय ब्रह्म मेँ बन्ध, मोक्ष आदिकी कल्पना का वर्णन ।