Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 169
एक सौ सड़सठवाँ सर्ग समाप्त एक यौ अड़सठवाँ सर्ग अबुद्धिपूर्वक सृष्टि के अध्यारोप का वर्णन और विचार से उसकी चिन्मात्रस्वरूपता तथा चित् के अधिकारी होने से सर्ग का अपवाद |
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- Verse 1सृष्टि को मिथ्या सिद्ध करने के लिए सृष्टि की अबुद्धिपूर्वकता का विविध दृष्टान्तो द्वारा स…
- Verses 2–5मे एक हूँ बहुत हले“ यों इच्छावाला होता है तदनन्तर इच्छावान् ब्रह्म से इश्वरोपाधिभूत अव्य…
- Verse 6जैसे केवल दिखाई देनेवाला चित्रलिखित जगत् केवल दीवारमात्र है वैसे ही चित् में आभासमात्र…
- Verse 7जैसे पूर्वोक्त वृक्ष, सागर आदि के वृत्तान्त में अबुद्धिपूर्वक प्रवृत्त हुआ भी शाखा, आवर्त…
- Verse 8जैसे वृक्ष में पत्ते, फूल, गुच्छे आदि के नाम वृक्ष से अन्य रखता हे वैसे ही समष्टिबुद्धिरू…
- Verses 9–10जैसे पत्ते, फूल, फल आदि महावृक्ष से अभिन्न (अपृथक) है वैसे ही चिदाकाशरूप परमात्मा से यह ज…
- Verse 11इस प्रकार नाम और रूपके अध्यारोप का विस्तार से वर्णन कर अब उनका अपवाद आरम्भ करते हैं । चिद…
- Verse 12यदि सृष्टि आदि है ही नहीं तो चित्को परलोक में व्यर्थ ही उसका अनुभव होता है यह मानना पड़े…
- Verse 13साकारअध्यास में वृक्ष आदि से चित् में यह विशेषता है कि साकार में वे सव साकारअध्यास हैं ल…
- Verses 14–16जैसे फूल में सुगन्ध आदि हैं, जैसे आकाश में शून्यता है तथा जैसे वायु में स्पन्द आदि हे वैस…
- Verses 17–20जैसे फूल में गन्ध आदि है, जैसे आकाश में शून्यता आदि है ओर जैसे वायु में स्पन्द आदि है वैस…
- Verse 21यदि कहे कि स्वप्न स्मृति ही है । अन्य स्मृतियों में, जो संस्कारजन्य तथा विषयशून्य होती है…
- Verse 22यदि कहो कि स्वाप्न-स्मृति के समय वन आदि में देखा गया बाघ आदि स्वप्नदेश में निद्रा द्वारा…
- Verse 23इसलिए स्वाप्नबोध की अनुभवरूपता का अपलाप न हो सकने से दृष्टान्त है ही, अतः जो मैंने कहा, व…
- Verse 24समुद्र मे तरंग आदि की तरह अबुद्धिपूर्वक उत्पन्न सृष्टि में स्वप्न आदि की अनुभवसिद्धि के अ…
- Verse 25जो कारण के बिना उत्पन्न होता है वह उत्पन्न हुआ भी अनुत्पन्न ही है इसलिए अजात (अनुत्पन्न)…
- Verse 26जैसे रत्न, मणि, माणिक्य आदि की कान्तियाँ अवुद्धिपूर्वक ही उत्पन्न हुई हैं वैसे ही ब्रह्मस…
- Verses 27–29यथाकथंचित् यानी अनिर्वचनीय मायारूप कारण के बल से ही सृष्टि के आरंभ सागर में आवर्तं की भा…
- Verse 30यह दृश्य शून्य ही उत्पन्न होता है, शून्य ही यह बढ़ता है ओर शून्यता से अत्यन्त अविद्यमान ह…
- Verse 31शून्य दृश्य सा विकास को प्राप्त होता हे, इस विषय में यानी असत् के विकास में स्वानुभूत स्…
- Verse 32सुकृत्रिम भ्रान्तिमात्र यह दृश्य मिथ्या ही प्रतीत होता हे चित् की चमत्कृति ही इसका वास्त…
- Verse 33यह प्रपंच चिरस्थायी मनोरथरूप ही हे, सृष्टि और प्रलय की भ्रान्ति इससे अतिरिक्त नहीं है । उ…
- Verse 34जैसे दुश्यशून्य आत्मा में सुषुप्तिके बाद स्वप्न देखा जाता है वैसे ही माया से उपहित ब्रह्म…
- Verse 35अकस्मात् दृश्य के स्फुरण में निमित्त की अपेक्षा नहीं है, ऐसा कहते हैं। जैसे सागर में आवर…
- Verse 36चित् के स्वभाव का ही स्पष्टीकरण करते हैं। आकाशमात्ररूप (शून्यरूप) यह चित्धातु ऐसा ही है…
- Verse 37पहले अबुद्धिपूर्वक दृश्याकार का भान होने से दृश्यभूत उस चिदात्मा ने पीछे अपने में अतीतरूप…
- Verse 38यदि तात्कालिक प्रतिभासो में ही विभागसंज्ञारूप भेदकल्पनामात्र ही जगत् है केवल प्रतिभास क्…
- Verse 39भगवान श्रीवशिष्ठजी श्रीरामचन्द्रजी की आशंका की प्रशसा करते हुए समाधान की प्रतिज्ञा करते ह…
- Verses 40–41यह आपके द्वारा लगाया गया दोष तव होता जब हम पहले असत् ही जगत् क्षणिक प्रतिभास के साथ उत्…
- Verse 42काठ की प्रतिमा को तो वृक्ष से छील- तराशकर यानी उसका आवरण करने वाले काठ के अवयवों को हटाकर…
- Verse 43तव प्रलय और युषुप्ति में भी उसका भान क्यो नहीं होता, यह यदि कहो तो सत्तासामान्यरूप से उस…
- Verses 44–45सृष्टि के आदि में भी पहले पूर्वोक्त निर्विकल्प कल्पनावती होकर पीछे भोगकर्ता के अदुष्ट के…
- Verse 46विति सृष्टि के आदि में कैसे विशेष विभागों का संकल्प करती है ? इसका विस्तार से वर्णन करते…
- Verse 47अध्यवसाय (निश्चय) प्रधान होने से यही बुद्धि हे, यही चित्त हे, यही काल है, यही आकाश है, यह…
- Verses 48–50यही इन्द्रियों का संघात है, यही पुर्यष्टक कही गई हैं, यहाँपर यही आतिवाहिक शरीर तथा आधिभौत…
- Verse 51इस रीति से यह विस्तारयुक्त जगत् बिना कारण का ही है । सृष्टि के आरम्भ में स्वप्न के तुल्य…
- Verse 52चिन्मय आकाश में ही जो चिन्मय आकाश स्फुरण है उसी ने उसे ही जगत् जाना, बोध होने के उपरान्त…
- Verses 53–55जबमात्रचिदाकाश ही है तो प्रपंचित विभागों का अस्तित्व नहीं है यह निष्कर्षनिकला, यह कहते है…
- Verse 56इसलिए भ्रमवश ज्ञात जगत् के जाज्यादि स्वभाव का त्यागकर जगत् चिन्मात्रस्वभाव है ऐसा स्वीक…
- Verse 57शून्यरूप यह दृश्य तनिक भी कुछ नहीं है ।पूर्णसागर में धूलि (विना भीगा रजकरण) कहाँ ? वैसे ह…
- Verse 58अथवा जो यह दुश्य-सा कुछ स्फुरित होता है वह चेत्यभिन्न चिन्मात्र ही हे । चेत्य रहित होने स…
- Verse 59उक्त अर्थ में पूर्णमदः पूर्णमिदम्“ इस श्रुति का स्मरण कराते है। पूर्ण ब्रह्म से पूर्ण भी…
- Verse 60इतने विस्तार के साथ प्रतिपादित प्रतिदिन दुहराये तिहराये गये उपदेश से भी कुछ मन्दअधिकारियो…