Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, Verses 14–16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, verses 14–16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 169 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
सुप्ता इवेह शय्यासु ये स्वप्ननगरे स्थिताः ।
सुप्ता इति त उच्यन्ते न तु ते जडतां गताः ॥ १४ ॥
दीर्घाध्वपरिविश्रान्तो विश्रान्तो न ददाति यः ।
वाक्यं स सुखमौनस्थः प्रोच्यते न जडाकृतिः ॥ १५ ॥
या निशा सर्वभूतानामविद्यास्तमयात्मिका ।
परो बोधः परा शान्तिस्तत्रासौ सममास्थितः ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे फूल में सुगन्ध आदि हैं, जैसे आकाश में शून्यता है तथा जैसे वायु में
स्पन्द आदि हे वैसे ही परमात्मा में बुद्धि आदि हैं