Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, Verse 46
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, verse 46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 169 · श्लोक 46
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
विति सृष्टि के आदि में कैसे विशेष विभागों का संकल्प करती है ? इसका विस्तार से वर्णन करते है ।
यह ब्रह्मकला सत्तासामान्यरूप जगत्बीजस्वरूप है । इस ब्रह्मकला में ही चिन्मात्र कल्पना यानी
सदा अनावृत स्वभाववाली यह प्रतिबिम्ब चिति है, यही प्राण आदि से युक्त होने से जीव है तथा
अभिमानवृत्ति की प्रधानता होने से यही अहंकार है