Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, Verse 42
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, verse 42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 169 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
परमेण स्वयत्नेन परिज्ञानात्स्वरूपिणा ।
स्वप्नसंदर्शनेनैव जीवन् खमिव खेन खे ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
काठ की प्रतिमा को तो वृक्ष से छील-
तराशकर यानी उसका आवरण करने वाले काठ के अवयवों को हटाकर बढ़ई निकालता है (प्रकट
करता है), किन्तु अद्वितीय चिद्रूपी स्तम्भ से उस जगत्रूपी प्रतिमा उससे अन्य कौन गढ़ता है यानी
कारक के अधीन न होने से काष्ठप्रतिमा की तरह उसकी अभिव्यक्ति नहीं हो सकती, यह अर्थ है ॥ ४ १॥
काष्ठप्रतिमा जड़ स्तम्भ में (खम्भ में) बिना छीलेतराशे प्रकट नहीं हो सकती, किन्तु चित् में भीतर
स्थित वह (जगत्रूप प्रतिमा) उसके अधिष्ठानभूत चित् के आवरण की निवृत्ति होनेपर चित् के प्रभाव
से चिदात्मा में ही पूर्णरूप से प्रकट होती है