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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, Verses 44–45

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, verses 44–45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 169 · श्लोक 44,45

संस्कृत श्लोक

प्रबुद्धः सुप्तः सुप्तोपि प्रबुद्धो रमतेनिशम् । सुषुप्तोभूत्ततो जाग्रत्स्वप्नार्थसुहृदा सह ॥ ४४ ॥ जन्मान्तरैकसहवाससमाशयेन चित्रानुवृत्तिमधुरेण चिरंतनेन । मित्रेण सार्धमखिलानि दिनानि नीत्वा विश्रान्तिमेष्यति पदे परमे चिरं सः ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

सृष्टि के आदि में भी पहले पूर्वोक्त निर्विकल्प कल्पनावती होकर पीछे भोगकर्ता के अदुष्ट के अनुसार उत्पन्न हुए मनोविकल्पों से स्वयं परमचिदाकाशरूपिणी वह चिति अपने आकाशरूप हृदय में चित्र विचित्र सृष्टिरूप प्रतिमा ओं की कल्पनाएँ अपने में स्वभावतः वैसे ही करती है जैसे स्वप्न में उत्पन्न कल्पनाओं की करती है