Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, Verse 56
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, verse 56 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 169 · श्लोक 56
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
इसलिए भ्रमवश ज्ञात जगत् के जाज्यादि स्वभाव का त्यागकर जगत् चिन्मात्रस्वभाव है ऐसा स्वीकार
करो इसी में कुशल है, ऐसा कहते है ।
इससे यह सिद्ध हुआ कि जैसा परम ब्रह्म है वैसा ही यह जगत् भी चिन्मात्रस्वभाव ही है, क्योकि जो
चिदाकाश है वही स्वप्न में स्वप्ननगर है उसमें कोई अन्तर नहीं हे