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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, Verse 43

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, verse 43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 169 · श्लोक 43

संस्कृत श्लोक

ज्ञानेनाकाशकल्पेन धर्मान् गगनसंनिभान् । ज्ञेन यत्नेन संबुद्धः परमाम्बरतां गतः ॥ ४३ ॥

हिन्दी अर्थ

तव प्रलय और युषुप्ति में भी उसका भान क्यो नहीं होता, यह यदि कहो तो सत्तासामान्यरूप से उस समय भी उसका भान होता ही है, ऐसा कहते है । प्रलय ओर सुषुप्ति में तो शून्यरूपा जगत्रूप प्रतिमा बिना गढ़े ही सत्तासामान्यरूप से भासमान चिन्मात्ररूप से अच्युत होकर ही चिदात्मा मेँ स्थित है