Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, Verses 53–55
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, verses 53–55 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 169 · श्लोक 53-55
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
जबमात्रचिदाकाश ही है तो प्रपंचित विभागों का अस्तित्व नहीं है यह निष्कर्षनिकला, यह कहते हैं ।
कहाँ स्मृति है, कहाँ स्वप्न है, कहाँ दिन, मास, संवत्सर आदि काल विभाग हैं, कहाँ विविध सृष्टि
कल्पनाएँ हैं ? यह शान्त चिद्भान ही आकाश में शून्यरूप जगत्सा मालूम पड़ता है। जो चिद्घन के
अन्दर है यानी चिद्घन की अन्तर्गत जो सत्ता है वह बाह्यता को प्राप्त हुई है वास्तव में तो सन्मात्र के
सिवा न वह बाह्य है और न आभ्यन्तर है। अरे अन्धे वादी लोगों, जो वस्तु अवयवशून्य निर्विकार
निराकार से प्रकट होती है, वह अकारण कैसे उत्पन्न होगी और वह कूटस्थ ही अन्यथा (सविकार)
केसे होगा ?