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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, Verse 11

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 169 · श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

धावित्वा ये चिरं कालं प्राप्तविश्रान्तयः स्थिताः । ते सुप्ता इव लक्ष्यन्ते व्यवहारपरा अपि ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार नाम और रूपके अध्यारोप का विस्तार से वर्णन कर अब उनका अपवाद आरम्भ करते हैं । चिद्रूप वृक्ष के चित्‌ होने के कारण ही उसकी पल्लवरूपी सृष्टियाँ सर्वथा नहीं हे । किन्तु वह चिद्रूपी वृक्ष ही स्वप्न के समान स्वयं कार्य ओर कारणसा प्रतीत होता है