Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, Verses 9–10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, verses 9–10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 169 · श्लोक 9,10
संस्कृत श्लोक
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः ।
यथाप्राप्तं विहरतः स विश्रान्त इति स्मृतः ॥ ९ ॥
अविश्रामे निरालम्बे दीर्घे संसारवर्त्मनि ।
चित्त्वादात्मनि विश्रान्तिः प्राप्ता येन जयत्यसौ ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे पत्ते, फूल, फल आदि महावृक्ष से अभिन्न (अपृथक) है वैसे ही
चिदाकाशरूप परमात्मा से यह जगत् अभिन्न ही है। जैसे वक्ष के अवयवभूत पत्र, पुष्प, फल आदि के
विविध नाम वृक्ष से अन्य रखता है वैसे ही चिदाकाश अपने में अन्यसा (व्यष्टिजीवसा) होकर स्वपुत्र
आदि के तथा अन्यान्य सकल कार्यों के विविध नाम रखता हे