Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, Verse 38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, verse 38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 169 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
सर्वेषां जगदर्थानां सत्तासामान्यतां गतः ।
आकाशादधिको व्यापी हा शेतेसुखमात्मवान् ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि तात्कालिक प्रतिभासो में ही विभागसंज्ञारूप भेदकल्पनामात्र ही जगत् है केवल प्रतिभास क्षण
में रहनेवाला जगत् अप्रतिभासकालनमें नहीं ही है यह फलित हुआ। ऐसी अवस्था में प्रतिभासक के उत्तर
क्षण में प्रतिभासका विनाश होनेपर जगत् का भी नाश होने से क्षणभंगवाद की प्राप्ति होगी । हो
क्षणभंगवाद, उस तरह के मायामय जगत् में स्थायिता सिद्ध करने में ब्रह्मवेत्ता का कोई प्रयोजन नहीं है,
ऐसा तो नहीं कह सकते, क्योकि लोक में स्मृति, प्रत्यभिज्ञा आदि पूवनुभूत की ही होती है ऐसा नियम
है । स्मृति ओर प्रत्यभिज्ञा के अधीन वेदशास्त्रादि के प्रामाण्य का भंग होने से ब्रह्मवाद की जड उखड
जायेगी, इस आशय से श्रीरामचन्द्रजी शंका करते हैँ ।
गुरुवर, आपके कथनानुसार जगत् के तात्कालिक कल्पनामात्र होनेपर प्रामाणिक अनुभव से उत्पन्न
संस्कार से पूर्वोत्पन्न बुद्धि की स्मृति और प्रत्यभिज्ञा होती है यों सर्वशिष्टानुभवसिद्ध नियम केसे प्राप्त
होगा ? क्या आप स्मृति ओर प्रत्यभिज्ञान को पूर्वानूभूत विषयिणी नहीं मानते ? यह मुझसे कहने की
(&) ईश्वरता भी मायासापेक्षस्वरूप है ।
कृपा कीजिए