Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, Verse 35
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, verse 35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 169 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
परमाणौ परमाणौ जगत्कोटिशतान्यपि ।
अणौ स्थूले दधद्देहे हा शेते सुखमात्मवान् ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
अकस्मात् दृश्य के स्फुरण में निमित्त की अपेक्षा नहीं है, ऐसा कहते हैं।
जैसे सागर में आवर्तं आदि काकतालीय न्याय से अकस्मात् अपने-आप प्रकाशित होते हैं वैसे
ही चित् में दुश्य काकतालीयन्याय से अकस्मात् अपने-आप ही चित्स्वभावता के कारण स्फुरित
होता है