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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, Verses 40–41

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, verses 40–41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 169 · श्लोक 40

संस्कृत श्लोक

इदमस्मज्जगत्पश्यन्स्वयमाकाशकोणके । विशदाकाशकोशात्मा हा शेते सुखमात्मवान् ॥ ४० ॥ यथा प्रवाहसंप्राप्तव्यवहारमनोरमे । तृण्यास्तरणविश्रान्तो हा शेते सुखमात्मवान् ॥ ४१ ॥

हिन्दी अर्थ

यह आपके द्वारा लगाया गया दोष तव होता जब हम पहले असत्‌ ही जगत्‌ क्षणिक प्रतिभास के साथ उत्पन्नहोता है ऐसे बौद्ध सिद्धान्त को स्वीकार करते। लेकिन हम वैसा स्वीकार नहीं करते, हम यह स्वीकार करते हैं कि नित्य ब्रह्मसत्तारूप ही जगत्‌ है वह नित्य चिदात्मक ही प्रतिभास से सदा अभिव्यक्तियोग्य है अविद्या की आवरणशक्ति ओर विक्षेपशक्ति की विचित्रता के चमत्कार से कभी आविर्भूतसा, तिरोहित सा, घट, पट आदि के आकारसा, छिन्नसा, भिन्नसा, कारणों द्वारा उत्पादितसा, अपरोक्षसा, एकसा, नानासा, भिन्नअभिन्नसा, क्षणिकसा, स्थायीसा, अतीतसा, वर्तमानसा, भविष्यत्‌सा नाना चमत्कारो से, जो नियत, अनियत, सदृश, असदृश हैं, एकसे नहीं हैं, अवभासित होता है। उसमें स्मृति, प्रत्यभिज्ञा आदि सब कुछ उपपन्न ही होता है, इस आशय से समाधान का आरम्भ करते हैं। यह जगदात्मक दृश्य वैसे ही चिन्मात्र के गर्भ में विद्यमान है जैसे कि वृक्ष में बढ़ई द्वारा काट छाँटकर न गढ़ी गई वन में स्थित प्रतिमा वृक्ष के अन्दर रहती है