Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, Verses 17–20

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, verses 17–20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 169 · श्लोक 17-20

संस्कृत श्लोक

यस्मिञ्जाग्रति भूतानि दृश्येऽस्मिन्दुःखदायिनि । तत्रासौ सततं सुप्तस्तन्न पश्यत्यसौ सुखी ॥ १७ ॥ यः कर्मौघमनादृत्य स्वात्मन्येवावतिष्ठते । स आत्माराम इत्युक्तो न जडोऽसौ रघूद्वह ॥ १८ ॥ दुःखादतिगतः सोऽस्मात्प्राप्तः पारं भवाम्बुधेः । तिष्ठत्यनुभवन्भव्यो विश्रान्तिसुखमात्मनि ॥ १९ ॥ दीर्घाध्वनि परिश्रान्तो विषयैश्चतुरैश्चिरम् । भोगभावातुरः क्रूरैः प्रोत्थितः पथि डामरैः ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे फूल में गन्ध आदि है, जैसे आकाश में शून्यता आदि है ओर जैसे वायु में स्पन्द आदि है वैसे ही चित्‌ मेँ ये पृथिवी आदि भी हैं। जैसे आकाश की शून्यता, वायु के स्पन्द ओर फूलों की गन्ध का अनुभव होनेपर उनसे पृथक्‌ करनेपर वे शून्यरूप हैं यानी आकाशादि से पृथक्‌ शून्यता आदि का अस्तित्व नहीं है (वैसे ही) चित्‌ में सर्गस्थिति अनुभूत होनेपर भी चित्‌ के बिना शून्यरूप हे ॥१५.१६॥ उक्त विषय का ही विशदरूप से प्रतिपादन करते हैं। जैसे शून्यता आकाश से अतिरिक्त नहीं हे, द्रवता जल से पृथक्‌ नहीं हे, गन्ध पुष्प से पृथक्‌ नहीं है, स्पन्द वायु से अलग नहीं है उष्णता अग्नि से अलग नहीं है ओर शीतलता हिम से (बरफ से) विलग नहीं है वैसे ही निर्मल चिदाकाश स्वरूप ईश्वर से जगत्‌ अतिरिक्त नहीं हे । सृष्टि के आदि में जो आकाश में दृष्टिगोचर होता है, स्वप्न से जो हृदयप्रदेश में दृष्टिगोचर होता है वह अकारण जाग्रत्‌ तथा स्वप्न जगत्‌ चिदाकाश से कैसे अतिरिक्त हो सकता है ? प्रतिदिन देखा गया स्वप्न ही इस विषय में दृष्टान्त है, उसपर विचार कीजिये । जरा बतलाइये तो सही स्वप्न में चिन्मात्र से अतिरिक्त क्या सार है ?