Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, Verses 2–5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, verses 2–5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 169 · श्लोक 2-5
संस्कृत श्लोक
यस्य न स्फुरति प्रज्ञा चिद्व्योमन्यचलस्थितेः ।
प्रसृतेष्विव भोगेषु स मुक्त इति कथ्यते ॥ २ ॥
चिन्मात्रात्मनि विश्रान्तं यस्य चित्तमचञ्चलम् ।
तत्रैव रतिमायातं स जीवन्मुक्त उच्यते ॥ ३ ॥
परमात्मनि विश्रान्तं यस्य व्यावृत्त्य नो मनः ।
रमतेऽस्मिन्पुनर्दृश्ये स जीवन्मुक्त उच्यते ॥ ४ ॥
श्रीराम उवाच ।
न सुखाय सुखं यस्य दुःखं दुखाय यस्य नो ।
जडमेव मुने मन्ये मानवं तमचेतनम् ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
मे एक हूँ बहुत हले“ यों इच्छावाला होता है तदनन्तर इच्छावान् ब्रह्म से इश्वरोपाधिभूत अव्याकृत
उत्पन्न होता है) इत्यादि श्रुतियों में सृष्टि बुद्धिपूर्वक की गई है ऐसा डिंडिमघोषहै । फिर आप सृष्टि
अबुद्धिपर्वक है ऐसा प्रत्यक्ष और श्रुति के विपरीत कैसे कहते हैं ?
समाधान : युनिये, जैसा आपने ऊपर प्रतिपादन किया है वैसा ही होता, यदि श्रुति का तात्पर्य
सृष्टि आदि के प्रतिपादन में होता । लेकिन भगवती श्रुतिका तात्पर्य सृष्टि आदि के प्रतिपादन में है
नहीं, क्योकि उसका कोई प्रयोजन नहीं है । सृष्टि के ज्ञान से किसी प्रयोजन की सिद्धि श्रुति में कहीं
भी प्रतिपादित नहीं है । अद्वितीय ब्रह्मात्मज्ञान ही सप्रयोजन है अतः सकल श्रुतियों में विस्तार से
वर्णित है। फलवान् (सप्रयोजन) अद्वितीय ब्रह्मात्मज्ञान के समीप मे श्रुत अफल (निष्प्रयोजन) सर्ग
आदि किमर्थ है ऐसी आकांक्षा होनेपर वह फलवान् ब्रह्मात्मैक्यज्ञान का अंग हो जाता है ओर वह
शांडिल्य विद्या के अगभूत शमविधि परक “सर्व खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत“ इस
वाक्य में चूँकि यह सारा जगत् उससे उत्पन्न होता है, अतः (तज्ज है, उसमें लीन होता है, अतः
(तल्ल“ है, उससे जीवित रहता है, अतः (तदन्* है, उत्पत्ति, स्थिति और लय में बरह्माधीन सत्तावाला
होने के कारण यह सव ब्रह्मरूप ही है यों ब्रह्मअद्वैत बतलाने में उपायभूत है, इस कारण श्रुति ने स्वयं
श्रीमुख से सर्ग की ज्ञानागता का सिद्धवत् कीर्तन किया है, अन्य प्रकार से उसकी संगति नहीं बैठ
सकती । (तदनन्यत्वमारम्भरणशब्दादिभ्यः* इत्यादि सूत्र, भाष्य आदि द्वारा बतलाई गई सैकड़ों
युक्तियों से, स्मृति, पुराण आदि हजारों वेदोपबुंहणों से अध्यारोप और अपवाद द्वारा निष्प्रपंच
ब्रह्मात्मतत्त्व के प्रतिपादन में सब श्रुतियों का तात्पर्य निश्चित होनेपर रज्जुसर्प, शुक्तिरजत,
मरुमरीचिका, स्वप्न आदि अध्यारोपों में अबुद्धिपूर्वकता ही देखी गई है, कहींपर भी अध्यारोप में
बुद्चिपूर्वकता नहीं देखी जाती यों भगवान् श्रीवसिष्ठजी सृष्टि में किसी को अनारोपितत्व शंका न
हो इसलिए सृष्टि की अबुद्धिपूर्वकता की सिद्धि करते हैं । रह गई श्रुतियों में ईक्षण आदि पूर्वकत्व
के कथन की बात। उसका प्रयोजन तो ब्रह्म की सर्वज्ञता, चिदेकरसता आदि के लाभ से साख्य
आदि के अभिमत अचेतन प्रधान आदि की उपादानता के निराकरण में है, क्योकि ईक्षतेनाशिब्दम्”
इत्यादि सूत्रों से ऐसा ही श्रुति का तात्पर्य दिखलाया गया है; (तस्य त्रय अवस्थास्त्रयः स्वप्नाः अर्थात्
जाग्रत्, स्वप्न और युषुप्तिरूप तीन स्वप्न उसके तीन स्थान हैं । यथा सतः पुरुषात् केशलोमानि
तथाक्षरात् संभवतीह विश्वम्” (जैसे जीवित यानी चेतनरूप से प्रसिद्ध पुरष से अचेतन केश, लोम
आदि उत्पन्न होते हैं वैसे ही ब्रह्म से सृष्टिकाल मेँ निखिल जगत् उत्पन्न होता है) इत्यादि श्रुतिद्ष्टान्त
के अनुरूप है; भगवान् के ईक्षण, कामना, संकल्प आदि के, जो बुद्धित्व की उत्पत्ति से पहले के
हैं, केवल मायावृत्तिरूप होने से सृष्टि के ईक्षण, कामना और संकल्पपूर्वक होनेपर भी काम, संकल्प
आदि धर्मवान् में अबुद्धिपूर्वकता की उपपत्ति होती है; त्वंपदार्थनिष्ठ ही अध्यारोप के अपवाद द्वारा
निरास में मुकितिरूप फलता उपपन्न होती है, इसलिए ततूपदार्थ में जगत् के अध्यारोपप्रतिपादन का
कोई प्रयोजन नहीं है; प्रपच स्वनिष्ठ अविद्या का कार्य है, अतः स्वविद्या से उसकी निवृत्ति हो सकती
है और अपने में अबुद्धिपूर्वक ही तीन अवस्थाओं के अध्यारोप का अनुभव होता है, इस आशय से
मुनि ने यहाँ अबुद्धिपूर्वकता का समर्थन किया है, यह समझना चाहिये ।
जैसे सागर अबुद्धिपूर्वक ही आवर्त, तरंग, बुदबुद् आदि की रचना करता है वैसे ही निराकार सर्वेश्वर
परमात्मा आकाश में जगत्-प्रतिभासों को (जगत् स्फुरणो को) बनाता है । तदनन्तर वह उन जगदाकार
स्वसंविदों की ही स्वयं मन, बुद्धि, अहंकार इत्यादि विविध संज्ञाएँ करता है । जैसे समुद्र से तरंग आदि
स्वतः होते हैं वैसे ही चित् से बुद्धि आदि की सिद्धि होने तक दृश्यरूप आरम्भ अबुद्धिपूर्वक स्वतः ही
होता है, लेकिन बुद्धि की सिद्धि होने के बाद संकल्प्यमान जो आरम्भ है वह बुद्धिपूर्वक होता हे । जैसे
सागर से आवर्तं (भवर), जलकण, बड़ी बड़ी लहरें और लहरियाँ निकलती हैं वैसे ही चिन्मात्र से मन,
बुद्धि आदि उत्पन्न होते हैँ