Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 169 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
न सुखाय सुखं यस्य दुःखं दुःखाय यस्य नो ।
अन्तर्मुखमतेर्नित्यं स मुक्त इति कथ्यते ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
सृष्टि को मिथ्या सिद्ध करने के लिए सृष्टि की अबुद्धिपूर्वकता का विविध दृष्टान्तो द्वारा समर्थन
करते हैं।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, जैसे वृक्ष अबुद्धिपूर्वक ही यानी 'मैं विचित्र शाखाओं
की रचना करता हू" यों बुद्धिपूर्वकता के बिना ही शाखाओं की विचित्रता का निर्माण करता है वैसे ही
जन्मादि विकाररहित परमात्मा आकाश सदृश अपने स्वरूप में शून्यरूप विचित्र प्रपंचअध्यासों की
सृष्टि करता है
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ सड़सठवाँ सर्ग समाप्त एक यौ अड़सठवाँ सर्ग अबुद्धिपूर्वक सृष्टि के अध्यारोप का वर्णन और विचार से उसकी चिन्मात्रस्वरूपता तथा चित् के अधिकारी होने से सर्ग का अपवाद |