Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 32
इकतीसवाँ सर्ग समाप्त बत्तीसवाँ सर्ग पुर्यष्टक में प्रविष्ट हुई यह चिति जिस प्रकार देहादि को क्रियाशील बनाती है तथा जिस प्रकार देहान्तर को प्राप्त होती है, उन सबका वर्णन |
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- Verse 1श्रीमहेश्वर ने कहा : हे मुने, पूर्वोक्त प्रकार से पुरुषों के पुर्यष्टक में प्रविष्ट हुई य…
- Verses 2–3एवं अपने मन से किये गये मननों से चेष्टित कायिक-वाचिक चेष्टारूप विहित-निषिद्ध कर्मसमूहात्म…
- Verse 4हे मुने, इसी मायाशक्ति के विचार एवं अविचारस्वरूप प्रसाद से इस संसार में क्रमशः कलंकयुक्त…
- Verse 5तब ब्रह्म-चिति के सान्निध्य से देह ही सबका निर्माण करेगा, चित्त आदि की कल्पना की क्या आवश…
- Verse 6जीव के प्राण एवं कर्मन्द्रियों से होनेवाले व्यापारो में सन्निधानमात्र से ब्रह्म साधारण का…
- Verse 7बुद्धि आदि के प्रकाश और ज्ञानेन्द्रियों के प्रयोजनो में (विषयों के ज्ञानो में) अपने प्रति…
- Verse 8शंका हो कि यदि ब्रह्म का प्रतिबिम्ब ही जीव है तो उसे अज्ञान, निद्रा आलस्य आदि जाज्य का अन…
- Verse 9मोह से चित्त का तिरोधान हो जाने के कारण अपना स्वरूप भूल गये गाधि, लवण, हरिश्चन्द्र आदि बड…
- Verse 10चित्त के साथ अभेदाध्यास से चिति में जिस प्रकार चित्त के धर्म दैन्य आदि की प्राप्ति हो जात…
- Verse 11जिस प्रकार पाल आदि उपाधि के वशीभूत हुए वायु के द्वारा नाव में स्थित पत्थर अपने अभीष्ट स्थ…
- Verse 12हे ब्रह्मन्, परमात्मा ने ही शरीररूपी गाड़ी खींचने के लिए मनःशक्ति और प्राण-शक्ति ये दो स…
- Verses 13–15स्वाप्निक व्यवहारों का भी संग्रह हो जाय इसलिए मन की ही रथरूप से कल्पना करनी चाहिए, मुख्य…
- Verse 16आत्मा में अध्यस्त होने के कारण आत्मसत्ता का ही आश्रय कर मानसिक वृत्तियों मे प्रतिबिम्बित…
- Verse 17पारमार्थिक चिन्मात्रस्वरूप से युक्त, विकाररहित परमात्मा की स्थिति रहने पर ही यह जीव अपना…
- Verse 18अब तक चिति देह-चेष्टा के प्रति कारण है, इसका उपपादन किया गया। अब उसकी देहान्तरे प्राप्ति…
- Verse 19जैसे तरंगरूप के होने पर जल विषमता प्राप्त करता है, वैसे ही आधि एवं व्याधि से आक्रान्त शरी…
- Verse 20जिस प्रकार सूर्य दर्शक की दृष्टि में अपने ही द्वारा प्रकाशित हुए मेघो से अदर्शनीयता, मलिन…
- Verse 21उपर्युक्त मलिनता आदि विवशता के कारण ज्ञान की अनधिकारिणी योनियं में जन्म-ग्रहण कर रही यह च…
- Verse 22तब चिति का मोह कब नष्ट होता है ? इस प्रश्न पर कहते है । जिस प्रकार मद आदि से जनित घनीभूत…
- Verses 23–24अव देहत्याग का प्रकार बतलाने के लिए भूमिका बोधते है। जिस प्रकार कोढी पुरुष अपने गलित अंगु…
- Verse 25हृदय -प्रदेश में स्थित उस पद्य-पत्र के कम्पनशून्य हो जाने पर ये प्राण भीतर तेज में उस प्र…
- Verse 26प्राणवायु का दूसरों के साथ सम्बन्ध विच्छिन्न हो जाने पर यह जीव निष्पूर्ण-मूकता को (रूपात्…
- Verse 27हे मुने, रजोगुणप्रधान अपने आधारभूत प्राण-वायु के शान्त हो जाने से ही रजोगुण से शून्य ओर आ…
- Verse 28वही जीव का देहत्याग है, यह कहते है। हे महर्षे, इस प्रकार चारों ओर से कारण-समूहों के विलीन…
- Verse 29तब पुर्यष्टक का किस हेतु से उद्भव होता है ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि हृदयकमल के स्पन्द…
- Verse 30हृदयरूप पद्म-पत्र के स्फुरण से यह पुर्यष्टक विस्पष्ट हो जाता है ओर हृदय-कमलरूप यन्त्र जब…
- Verse 31हे द्विज, जब तक देह में पुर्यष्टक विद्यमान रहता है, तब तक देह जीवित रहती है (ओर जव) देह म…
- Verses 32–33परस्पर विरुद्ध वात, पित्त ओर कफ नामक मलों तथा वासना के मलभूत राग, द्वेष आदि दोषों के प्रक…
- Verses 34–36जब शरीर का हृदय-कमलरूपी यन्त्र सदा चलता रहता है तब यह जीव अपने संकल्पवश मरण आदि हजारों दु…
- Verse 37इसीलिए भोग की वासना से रहित पुरुषों मे भोगसंकल्प का अभाव होने से वे मृत्यु के अधीन नहीं ह…
- Verse 38उस प्रकार ही विलीन हुए पुनः स्वर्ग, नरक आदि का भोग करानेवाले अदृष्ट द्वारा बोधित हुए मन क…
- Verse 39जिस प्रकार घर के लोगों के घर छोडकर दूर चले जाने पर घर शून्य हो जाता है, उसी प्रकार मन एवं…
- Verses 40–41अव चिति के शरीरान्तर-ग्रहण में क्रम बतलाते हैं। सर्वव्यापक चिति ही मन में स्थित होकर चेतन…
- Verse 42पंचतन्मात्राओं के समूहभूत आतिवाहिक देह नामवाले पुर्यष्टक चित्त को गोद में लेकर स्थित हुई…
- Verse 43असत्-स्वरूप उक्त लक्षणवाले स्थूल शरीर में ही कृत्रिम अहंभावना किये हुई यह चिति असत्यभूत…
- Verse 44चित्त के संसरण में क्रम बतलाते हैं। सर्वगामिनी इस चिति ने ही बुद्धि में प्रतिबिम्बित अपने…
- Verse 45और जब सूत्रात्मा प्राणवायु से भरे हुए इस पुर्यष्टकरूप शरीर को पर्याप्तरूप से और ऊपर उठाता…
- Verse 46एवं पुर्यष्टक के क्षीण हो जाने पर यह चित्त हृदयाकाश मे जव विलीन हो जाता है तब यह देह काष्…
- Verse 47यह जीव अज्ञानवश अपनी अजर-अमर ब्रह्मरूपता भूलकर कालवश प्राप्त हुई वृद्धदेह में रहनेवाली अश…
- Verse 48इसके बाद वह पहले की तरह मर जाता है, यह कहते हैं। हे मुने, जीवसम्बन्धिनी पूर्वोक्त पूर्व -…
- Verse 49पुनः पुनः नाना शरीरे का ग्रहण और उनमें संसरण जरा एवं मरण मेही पर्यवसायी है, यह जानना चाहि…
- Verse 50जीवों के ये शरीर और वृक्षों के पत्ते उत्पनन और नष्ट हुआ ही करते हैं (अतः) उनके विषय में श…
- Verse 51चैतन्य-समुद्र में ये देहरूपी बुद्बुदों की पंक्तियाँ यहाँ एक प्रकार की तो दूसरी जगह दूसरे…
- Verses 52–53कथित अर्थ का ही उपसंहार करने के लिए अनुवाद करते हैं। सर्वत्र व्याप्त भी यह चिति इसी चित्त…