Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, Verses 32–33

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, verses 32–33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 32,33

संस्कृत श्लोक

विरुद्धमलसंबोधाच्छेदभेददशावशात् । न प्रस्फुरति हृत्पद्मयन्त्रमभ्यन्तरे यदा ॥ ३२ ॥ तदा पुर्यष्टकं शान्तिमुपैति गगने शनैः । संरोधिते वातयन्त्रे यथा पवनसंततिः ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

परस्पर विरुद्ध वात, पित्त ओर कफ नामक मलों तथा वासना के मलभूत राग, द्वेष आदि दोषों के प्रकोप से एवं शस्त्र आदि से किये गये देह के छेदनभेदन आदि अवस्थावश जब यह हृदयकमलरूप यन्त्र देह के अन्दर स्पन्दित नहीं होता तब यह पुर्यष्टक धीरे-धीरे उस प्रकार विलीन हो जाता हे, जिस प्रकार पंखा रोक देने पर हवा की परम्परा आकाश में विलीन हो जाती हे