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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, Verse 29

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, verse 29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 29

संस्कृत श्लोक

चिच्चेत्यचेतनान्मोहात्स्पन्दमायान्ति वासनाः । तदीरिता स्मरत्यन्तरन्यद्विस्मरति स्वयम् ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

तब पुर्यष्टक का किस हेतु से उद्भव होता है ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि हृदयकमल के स्पन्दन से उसका उद्भव होता है । हृदय-कमल का स्पन्दन पूर्व-पूर्वभोक्ता आदि के स्वरूपों के स्मरण से होता है । उक्त स्मरण वासना के स्पन्दन से होते हैं और वासना का स्पन्दन स्वरूप के अज्ञान से उत्पन्न चिति के चेत्याकारक ज्ञान से होता है, इसलिए तत्त्व की ओर अभिमुख होने के लिए पुरुष को ज्ञानात्मक बहिमुखतारूप चिति की वेत्याकारता ही पहले अपने प्रयत्न से रोकनी चाहिए. इस आशय से कहते है । मोह से यानी अपने स्वरूप के अज्ञान से उत्पन्न चिति में विषयाकारता के ज्ञान से वासनाएँ स्पन्दित होती हैँ । उनसे (स्पन्दित वासनाओं से) प्रेरित हुई यह चिति अपने भीतर पूर्व पूर्व काल के भोक्तृत्व आदि का स्मरण करती है ओर दूसरा अपना स्वरूप स्वयं भूल जाती है