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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, Verse 27

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 27

संस्कृत श्लोक

विरजं विगताधारं मनो हि शिष्यते मुने । तिष्ठत्यात्मपदं लब्ध्वा जलादितरुबीजवत् ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

हे मुने, रजोगुणप्रधान अपने आधारभूत प्राण-वायु के शान्त हो जाने से ही रजोगुण से शून्य ओर आधाररहित हुआ मन भी प्राण के ही साथ कारणरूप पद को प्राप्तकर उसी रूप से अवशिष्ट रह जाता है । (तब क्या वह सर्वथा नष्ट नहीं हुआ ? इस पर कहते है ।) जल आदि भूतमात्राओं से मिश्रित पार्थिव वृक्ष-बीज जिस प्रकार दूसरा अंकुर उत्पन्न करने के लिए तत्पर होकर स्थित रहता है, उसी प्रकार यह मन भी दूसरी देह का आविर्भाव करने के लिए तत्पर होकर स्थित रहता हे