Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, Verse 49
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, verse 49 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 49
संस्कृत श्लोक
यथा जातानि जातानि चान्यान्यन्यानि कालतः ।
वृक्षात्पर्णानि शीर्यन्ते शरीराणि तथा नृणाम् ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
पुनः पुनः नाना शरीरे का ग्रहण और उनमें संसरण जरा एवं मरण मेही पर्यवसायी है, यह जानना
चाहिए - इस आशय से कहते हैं।
जिस प्रकार विभिन्न विभिन्न पत्ते उत्पन्न हो-होकर समय पाकर वृक्ष से झड़ जाते हैं, उसी प्रकार
जीवों के ये शरीर भी झड़ जाते हैं