Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, Verses 40–41
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, verses 40–41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
सर्वगा चिच्चेतनतो जीवीभूय मनःस्थिता ।
पुर्यष्टकवपुर्भूत्वा साऽऽतिवाहिकदेहिनी ॥ ४० ॥
तन्मात्रपञ्चकं चित्तं क्रोडीकृत्य व्यवस्थिता ।
स्वप्नभ्रमवदाकारं भावात्स्थूलं प्रपश्यति ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
अव चिति के शरीरान्तर-ग्रहण में क्रम बतलाते हैं।
सर्वव्यापक चिति ही मन में स्थित होकर चेतन से “अनेन जीवेनाऽऽत्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे
व्याकरवाणि" (इसी जीवरूप आत्मा से जगत में प्रवेश कर मैं नाम एवं रूप का व्याकरण करूँ) इस श्रुति
में कहे गये चेत्य के आकार में अनुप्रवेश से जीव बनकर मनोरूप में स्थित हो जाती है । तदनन्तर
पुर्यष्टक शरीर धारण कर आतिवाहिक देहवाली हो जाती है