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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, Verse 26

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, verse 26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 26

संस्कृत श्लोक

प्राणे शान्तेतरस्पर्शे जीवो निष्पूर्णमूकताम् । याति शान्ते नभोवायौ न दृश्यत्वं यथा रजः ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

प्राणवायु का दूसरों के साथ सम्बन्ध विच्छिन्न हो जाने पर यह जीव निष्पूर्ण-मूकता को (रूपात्मक उपाधियों के विलय से निरावाध पूर्ण तथा नामात्मक उपाधिय के विलय से मूक कारणात्मा के स्वरूप को) ऐसे प्राप्त होता है, जैसे आकाश- वायु के शान्त हो जाने पर रजःकण कारणरूपता को प्राप्त हो जाता हे