Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
ईश्वर उवाच ।
मुने श्रृणु कथं कार्यकारिणी स्पन्दशालिनी ।
चरन्ती च तनुं पुंसामुपैति परमाभिधाम् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीमहेश्वर ने कहा : हे मुने, पूर्वोक्त प्रकार से पुरुषों के पुर्यष्टक में प्रविष्ट हुई यह श्रेष्ठ चिति किस
प्रकार ऐहिक एवं पारलौकिक कार्य करनेवाली होती है और उन कर्मो के अनुकूल देहादि में स्पन्दनशील
होती हुई किस प्रकार अभिधा (जाती है, नहाती है, खाती है ओर याग करती है तथा ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं
देवदत्त आदि शब्दों से व्यवहार करने की योग्यता) प्राप्त करती है, वह सब मैं कहता हूँ, आप सुनिए
सर्ग सन्दर्भ
इकतीसवाँ सर्ग समाप्त बत्तीसवाँ सर्ग पुर्यष्टक में प्रविष्ट हुई यह चिति जिस प्रकार देहादि को क्रियाशील बनाती है तथा जिस प्रकार देहान्तर को प्राप्त होती है, उन सबका वर्णन |