Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, Verses 13–15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, verses 13–15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 13-15
संस्कृत श्लोक
चिज्जडं तूररीकृत्य रूपं जीवत्वमेत्य च ।
मनोरथमुपारुह्य वहत्प्राणतुरंगमम् ॥ १३ ॥
क्वचिज्जातपदार्थत्वं क्वचिन्नष्टपदार्थताम् ।
क्वचिद्वहुपदार्थत्वं क्वचिदेकपदार्थताम् ॥ १४ ॥
गतेव भिन्नेवास्त्येवमत्यजन्ती निजं पदम् ।
जलतेव तरङ्गत्वं सैवासदसदोदिता ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वाप्निक व्यवहारों का भी संग्रह हो जाय इसलिए मन की ही रथरूप से कल्पना करनी चाहिए,
मुख्य एवं अमुख्य प्राणो की तो घोड़ों के रूप से इस आशय से कहते हैं ।
महर्षे, पहले जडरूप स्वीकार कर ओर तदनन्तर जीव रूप प्राप्तकर प्राणरूप घोड़ों से खींचे जा
रहे मनरूपी रथ पर आरूढ होकर यह चिति कहीं (जाग्रत एवं स्वप्न-अवस्था में) आविर्भूत पदार्थो की
स्वरूपता, कहीं (उन्हीं अवस्थाओं में) बहुपदार्थता, कहीं (सुषुप्ति-अवस्था में ) तिरोभूत समस्त
पदार्थो की स्वरूपता एवं कहीं (उसी अवस्था में) एकमात्र अविद्यारूपपदार्थ-स्वरूपता को प्राप्त हुई-
सी भिन्न-भिन्न-सी होकर स्थित रहती हे । (तव जैसे दधिरूपता प्राप्तकर दूध विनष्ट हो जाता है,
वैसे ही वह क्या जीव ओर जगत-रूप प्राप्तकर नष्ट हो जाती है 2 इस पर नहीं, ऐसा उत्तर देते है ।)
इस प्रकार परिणत होने पर भी अपना पारमार्थिक स्वरूप न छोडती हुई यह चिति उस प्रकार स्थित
रहती है, जिस प्रकार तरंग अपनी पारमार्थिक जलरूपता न छोडता हुआ स्थित रहता है ओर वही
चिति तत्त्वदृष्टि से असत् जाग्रत-अवस्था की नाई एवं व्यावहारिक दृष्टि से भी असत् स्वप्न की नाई
किंचित् विकसित होती है