Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, Verse 43
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, verse 43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
असत्येव शरीरेऽस्मिन्कृतकृत्रिमभावना ।
नयत्यसत्यं सत्यत्वं सत्यं चासत्यतामपि ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
असत्-स्वरूप उक्त लक्षणवाले स्थूल शरीर में ही कृत्रिम अहंभावना किये हुई यह
चिति असत्यभूत इस जगत में आरोप द्वारा सत्यता प्राप्त कराती है और सत्यभूत अपने ब्रह्मभाव में
"नाऽस्ति", “न भाति" इत्यादि प्रतीति-योग्यतारूप असत्यता प्राप्त कराती है