Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, Verse 7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
सर्वस्थयात्मशक्त्यैव जीव एष स्फुरत्यलम् ।
मुकुरो बिम्बमादत्ते द्रव्यात्मन्यस्थितादपि ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
बुद्धि आदि के प्रकाश और ज्ञानेन्द्रियों के प्रयोजनो में (विषयों के ज्ञानो में) अपने प्रतिबिम्ब के
समर्पण द्वारा चिति असाधारण कारण है, इस आशय से कहते है।
सर्वत्र स्थित आत्मरूप इस चित्शक्ति से ही यह जीव पर्याप्तरूप से अपने ओर दूसरे के प्रकाशन
में समर्थ होता हे । (यदि शंका हो कि भौतिक होने से द्रव्यस्वभाव में अवस्थित जीव का उपाधिभूत यह
लिंग शरीर अद्रव्यस्वभाव (गुण और कर्म के अनाश्रय) ब्रह्म का प्रतिविम्ब कैसे ग्रहण करेगा, क्योकि
द्रव्य में द्रव्य का ही प्रतिबिम्ब पड़ता है, ऐसा नियम है, तो इस पर कहते हैं।) द्रव्यस्वभाव में अवस्थित
न हुए भी गुण, क्रिया, जाति आदि से दर्पणरूप द्रव्य प्रतिबिम्ब ग्रहण करता है । अतः द्रव्य द्रव्य से ही
प्रतिबिम्ब ग्रहण करता है, यह नियम नहीं है