Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, Verse 37
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, verse 37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
यथैव व्योम मरुति लीनं पुर्यष्टकं भवेत् ।
तथैव तत्रैव तदा लयमेति मनो मुने ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
इसीलिए भोग की वासना से रहित पुरुषों मे भोगसंकल्प का अभाव होने से वे मृत्यु के अधीन नहीं
होते हैं, यह कहते हैं।
राग, द्वेष आदि मलों से रहित वासना जिनके हृदय से हटती नहीं, वे अटल एवं समान रूपवाले
जीव जीवन्मुक्त होकर दीर्घायु रहते हैं ॥ ३ ५॥ पद्म-यन्त्र के रुक जाने तथा तेज में प्राण के विलीन हो
जाने पर धृतिशून्य हुई यह देह पृथ्वी पर लकड़ी ओर ढेला आदि की नाई गिर जाती है ॥३ ६॥ हे मुने,
ज्यों ही हृदयाकाश के वायु में अर्थात् प्राण में यह पुर्यष्टक लीन हो जाता है, त्यों ही मन वहीं (प्राण में
ही) विलय को प्राप्त हो जाता है