Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, Verse 22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
प्राप्य चाप्यनुसंधानमस्या मोहो विनश्यति ।
घनमोहरतो जन्तुः स्वकार्यस्मरणं यथा ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
तब चिति का मोह कब नष्ट होता है ? इस प्रश्न पर कहते है ।
जिस प्रकार मद आदि से जनित घनीभूत मोह में फसा हुआ जीव कुछ समय के बाद अपने कर्मो का
स्मरण कर मोहरहित हो जाता है, उसी प्रकार अपने स्वरूप का स्मरण कर इस चित्शक्ति का मोह
नष्ट हो जाता हे