Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, Verse 42
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, verse 42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
दृढभावनया पश्चात्तत्रैव रसशालिनी ।
आतिवाहिकदेहत्वं विस्मरत्यखिलं क्षणात् ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
पंचतन्मात्राओं के समूहभूत
आतिवाहिक देह नामवाले पुर्यष्टक चित्त को गोद में लेकर स्थित हुई (बैठी हुई) यह चिति ही अपने
संकल्प से, स्वप्न भ्रम की नाई, अपनी स्थूल आकृति देखती है ॥४ १॥ इसके बाद दृढ़ भावना के द्वारा
उसी स्थूल शरीर में अहंकारशक्ति से युक्त होकर यह चिति क्षण में ही सम्पूर्णं आतिवाहिक देहता भूल
जाती है