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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, Verse 18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

आधयो व्याधयश्चैव प्रयान्त्यस्य प्रपीनताम् । अपामिव तरङ्गत्वं वीचित्वस्येव फेनता ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

अब तक चिति देह-चेष्टा के प्रति कारण है, इसका उपपादन किया गया। अब उसकी देहान्तरे प्राप्ति का प्रकार बतलाने तथा वैराग्य उत्पन्न कराने के लिए देह से होनेवाले दुःखो का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं। अज्ञान-अवस्था में इस जीव की आधियाँ एवं व्याधियाँ उस प्रकार उत्तरोत्तर स्थूलता प्राप्त करती हैं, जिस प्रकार जल का तरंगरूप ओर उस तरंगरूप का फेनरूप उत्तरोत्तर स्थूलता प्राप्त करता है