Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, Verse 38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, verse 38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
सुचिराभ्यस्तभावं तु वासनाखचितं मनः ।
यत्र तत्र भ्रमत्स्वर्गनरकादि प्रपश्यति ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
उस प्रकार ही विलीन हुए पुनः स्वर्ग, नरक आदि का भोग करानेवाले अदृष्ट द्वारा बोधित हुए मन
का हृदयाकाश मेँ चक्षु से, मूर्धा से अथवा अन्य शरीर-प्रदेशों से निकलना. यमलोक आदि में जाना;
स्वर्ग ओर नरक का भोग करना आदि उसकी अपनी कल्पना ही है, वास्तव मे स्वर्ग आदि नाम के कोई
दूसरे पदार्थ बाहर हैं ही नहीं, इस आशय से कहते है।
हे महर्षे, तत्-तत् भोग करने के योग्य शरीर आदि पदार्थो का चिरकाल से अभ्यास किया हुआ
तथा वासना से परिपूर्ण यह मन जहाँ-तहाँ घूमता फिरता स्वर्ग, नरक आदि देखता रहता है