Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, Verse 21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
वैवश्याच्चयवती मौढ्यान्न विन्दत्यात्मसंविदम् ।
घनजाड्यपराभूतः स्वाङ्गावदलनं यथा ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
उपर्युक्त मलिनता आदि विवशता
के कारण ज्ञान की अनधिकारिणी योनियं में जन्म-ग्रहण कर रही यह चित्शक्ति मूढता से अपना
स्वरूप उस प्रकार नहीं जानती, जिस प्रकार मदिरा आदि के घन मद से आक्रान्त हुआ पुरुष खड्ग
आदि से अपना अंगच्छेदन नहीं जानता