Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 71
32 verse-groups
- Verse 1सत्तरवाँ सर्ग असंग सुख में परम शान्ति को प्राप्त कर रहा पुरुष व्यवहार से उत्पन्न दोषों से…
- Verse 2उनकी वैसी स्थिति होती है, यह आपने किस प्रमाण से जाना ? इस प्रश्न पर प्रमाण कहते हैं। हे श…
- Verse 3जिस तत्त्ववित् के अनुग्रह से दूसरे भी जब क्षोमरूपी मलिनता से निर्मुक्त हो जाते हैं, तब उ…
- Verse 4सदा सर्वदा आत्मदृष्टि में निमग्न रहनेवाला तत्त्ववित् बाहर से चंचल होते हुए भी अपने स्वरू…
- Verse 5स्वस्वरूप मेँ निरन्तर रमण करनेवाले तथा परम मोक्षरूपी उदय को प्राप्त हुए तत्त्ववित् महात्…
- Verse 6विक्षोभ के प्रतीत होने पर भी वस्तुतः तत्ववित् मे क्षोभ नहीं रहता, इस विषय मे दृष्टान्त क…
- Verse 7जैसे जल रेखा कमल को रंजित नहीं कर सकती, वैसे ही जिसने जीव और ईश्वर के स्वरूप को भलीर्भोति…
- Verse 8जब तक जीव भीतर भली प्रकार आसक्ति से वर्जित नहीं होता, तब तक उसका बाहर की आसक्ति से वर्जित…
- Verse 9ज्ञान की परिपक्व अवस्था के उत्कर्ष से आत्मसक्ति्मे भी क्रमशः उत्कर्षे बढ़ता जाता है ओर तद…
- Verse 10हे श्रीरामचन्द्रजी, पूर्वोक्त स्वरूपवाली असंसक्त दुष्ट मेँ परिणत, प्रियाप्रिय आदि द्वन्द्…
- Verse 11स्वसंसक्तिरूपी दृष्टि में अभ्यास क्रम से परम प्रौढता को प्राप्त हुआ जीव पवित्र सूर्यभाव क…
- Verse 12जाग्रत् अवस्था में ही सुषुप्तस्थ है, यह जो पहले कहा था, उसे विशद करते है। चित्त के विषय…
- Verse 13हे श्रीरामजी, उक्त सुषुप्त- दशा को प्राप्त होकर जी रहा तथा व्यवहार कर रहा पुरुष सुख-दुःखर…
- Verse 14जो पुरुष जाग्रत् में ही सुषुप्तस्थ होकर जगत् के व्यवहाररूपी कार्यों को करता है, निरंहभा…
- Verse 15चित्त में चोट (पीड़ा) पहुँचानेवाली अहंकाररूपा ही शक्ति है, क्योकि वह इष्ट ओर अनिष्ट के सं…
- Verse 16पूर्व से ही यानी साधन अवस्था से ही लेकर अभिनिवेश का परित्याग कर कर्मो का अनुष्ठान कर रहा…
- Verse 17हे अनघ, सुषुप्ति की विकारशून्य वृत्ति का अवलम्बन लेकर आप वर्णाश्रम-स्वभाव के अनुसार प्रार…
- Verse 18आश्रमोचित कर्मो का भी परित्याग कर देना चाहिए, ऐसा जो लोग मानते हैं, उसके प्रति कहते हैं ।…
- Verse 19हे श्रीरामचन्द्रजी, आप सुषुप्ति अवस्था में रहनेवाली निर्विकार बुद्धि से युक्त यानी तत्त्व…
- Verse 20हे राघव, जैसे किसी प्रयोजन की अभिलाषा न रखकर केवल लीलावश ही बालक पलंग के ऊपर स्पन्दन क्री…
- Verse 21विषय सम्बन्ध से शून्य चैतन्यरूप परम पद मे प्रतिष्ठित हुआ अतएव बाह्य इन्द्रियो के व्यापारर…
- Verse 22सुषुप्ति की विकारशून्य अवस्था को प्राप्त कर ओर अपने चित्त मे समस्त वासनाओं से रहित होकर ज…
- Verse 23जैसे छह ऋतुओं में अविकृत स्वभाव होने के कारण पर्वत एक सा रहता है वैसे ही पूर्णचन्द्र के ब…
- Verse 24जैसे वायु से बाहर के वृक्ष, तृण आदि में कपन होने से ऊपर-ऊपर से पर्वत के प्रस्पन्दित (प्रक…
- Verse 25जैसे क्रियाओं में उसकी निर्विकारता है, वैसे ही मरण और जीवन में भी उसकी निर्विकारता है, इस…
- Verse 26तत्त्वज्ञो को सदा सर्वदा ही तुरीयावस्था होती है, यही कहना युक्तिसंगत हो सकता है, परन्तु य…
- Verse 27तब सुषुप्ति स्थिति कहने का अभिप्राय क्या है ? इस प्रश्न पर वैसा कहनेका अभिप्राय कहते हैं।…
- Verse 28निर्विकार सुषुप्ति अवस्था में स्थित तत्त्वज्ञ को जगत् का अनुभव कैसे होता है ? उसे बतलाते…
- Verse 29यदि शंका हो कि उस प्रकार की लीला का अनुभव कर रहा ज्ञानी उस जगत् मे फिर आसक्त भी तो हो जा…
- Verse 30क्यो संसार में नहीं गिरता ? इस प्रश्न पर कहते हैं। पर्वत पर चढ़ा हुआ धीर पुरुष पर्वत को ह…
- Verse 31हे श्रीरामचन्द्रजी, पहले अनानन्द को यानी अवस्थात्रय पद को प्राप्त हुआ ज्ञानी इस तुर्यावस्…
- Verses 32–72इस प्रकार जीवन भर ज्ञानी की तुर्यावस्था रहती है, यह कह कर अन्त में विदेह अवस्था को प्राप्…