Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 71, Verse 28
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 71, verse 28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 71 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
सर्वमात्ममयं शान्तमित्येवं प्रत्ययं स्फुटम् ।
सबाह्याभ्यन्तरं राम सर्वत्र दृढतां नय ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
निर्विकार सुषुप्ति अवस्था में स्थित तत्त्वज्ञ को जगत् का अनुभव कैसे होता है ? उसे बतलाते हैं।
उक्त सुषुप्ति अवस्था में सदा सर्वदा रहनेवाला ज्ञानी अत्यन्त प्रमोद से परिपूर्ण ओर निरतिशय
आनन्दरूपी मद से मत्त होकर इस जगत् की रचना को सदा एक तरह की मानों लीला ही देखता
रहता है