Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 71, Verse 14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 71, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 71 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
जलमेव यथाम्भोधिर्न तरङ्गादिकं पृथक् ।
आत्मैवेदं तथा सर्वं न भूतोयादिकं पृथक् ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
जो पुरुष जाग्रत् में ही सुषुप्तस्थ होकर जगत् के व्यवहाररूपी कार्यों को करता है,
निरंहभाव के सादृश्य से नर्तक प्रतिमा के तुल्य शरीरवाले उस पुरुष को सुख-दुःख का अनुभव प्राप्त
नहीं होता