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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 71, Verse 8

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 71, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 71 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

देहनाशेन कोऽर्थस्ते कोऽर्थस्ते देहसंस्थया । भव त्वं प्रकृतारम्भस्तिष्ठत्वेष यथास्थितम् ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

जब तक जीव भीतर भली प्रकार आसक्ति से वर्जित नहीं होता, तब तक उसका बाहर की आसक्ति से वर्जित होना दुर्लभ है, इस आशय से असंसक्त का लक्षण कहते हैं। जब यह जीव परमात्मा का ज्ञान प्राप्त कर समस्त कल्पनाओं के हेतुभूत मलों से वर्जित होता हुआ ध्यानाभाव-दशा में भी आत्म ध्यान की तरह निरतिशय सुख में निमग्न रहता है, तब 'स्वसक्त” कहलाता है । तत्त्ववित्‌ को स्वभावतः निरतिशयानन्द आत्मा का स्फुरण (प्रकाश) होने के कारण वह निर्विकल्प समाधि की नाई सदा-सर्वदा आत्मध्यान मेँ ही लगा हुआ रहता है, अतएव बाह्यध्यान- व्यापारो के न रहने पर भी तथोक्त स्फुरण की सामर्थ्य से निरतिशानन्द सुखसमुद्र मे अवगाहन करनेवाला यह “स्वसक्त' शब्द से व्यवहृत किया जाता है, यह तात्पर्य हे